शुक्रवार, 3 मई 2013

स्वामी श्री खेतादास मन्दिर, लोहार्गल

स्वामी श्री खेतादास  मन्दिर, लोहार्गल

                       
                    लोहार्गल धाम (झुंझुनू) के कुछ दुरी पर ही स्वामी श्री खेतादास जी महाराज द्वारा स्थापित रैगर समाज द्वारा संचालित रैगर धर्मशाला में  स्वामी खेतादास व स्वामी मखनदास जी का प्राचीन मन्दिर स्थित हैं। यह पवित्र धार्मिक स्थान लगभग 150 वर्ष प्राचीन हैं। इसे रैगर समाज का “शक्ति स्थल भी कहते हैं। रैगर  श्रृधापूर्वक धार्मिक आस्था से इस पवित्र स्थान से जुडे हुए हैं। जो कि उनका अपना हैं। समाज के लोग रैगर समाज का यहा प्रतिवर्ष भाद्रपद की अमावस्या को भरने वाले लोहार्गल विशाल मेला के अलावा वैशाख पूर्णिमा को रैगर
धर्मशाला   मे भव्य सत्संग व भण्डारा , मेला का कार्यक्रम होता हैं। यहॉ इस मन्दिर से रैगर समाज के लोगो की आस्था प्राचीन समय से ही जुड़ी हुई हैं। इसलिए बहुत अधिक संख्या मे यहा श्रृदालुगण पहुचते हैं। यहॉ छोटे बच्चों का मुण्डन व जात दी जाती हैं। और नव विवाहित जोडों की भी जात लगाई जाती हैं।
                   श्रृदालुगण को किसी प्रकार की परेशानी न हो इसलिए मन्दिर स्वामी खेतादास समिति द्वारा उन्हे यहा मुफ्त मे खाने पीने तथा रहने की सुविधा उपलब्ध की जाती हैं।  तथा यहा
धर्मशाला   मे स्वामणी, प्रसाद करने वाले व्यक्तियों के लिए बर्तन, चुल्हा, दरी-पट्टी, पानी आदि हर प्रकार की सुविधा निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती हैं।  समिति के भण्डार गृह मे इतना समान हैं कि आप एक साथ 10-12 सवामणी एक साथ कर सकते हैं।
                    समिति का संचालन समस्त रैगर समाज द्वारा दिये गये चन्दा राशि से किया जाता हैं। समाज का कोई भी व्यक्ति इस समिति का 1100 रुपये देकर आजीवन सदस्य बन सकता हैं। तथा समाज के लोगो द्वारा समिति के सफल संचालन के लिए एक कार्यकारणी का चुनाव प्रतिवर्ष
वैशाख पूर्णिमा के मेले पर किया जाता हैं। इसके अलावा मन्दिर मे पुजा-अर्चना करने के लिए समिति के  खर्चे पर पुजारी रहता हैं। मन्दिर व धर्मशाला कि देखभाल पुजारी, कार्यकारणी और आप जैसे महान लोगो पर हैं। मन्दिर व धर्मशाला के विकास मे आप लोगो द्वारा दिया गया सहयोग सरहनीय हैं, जिसका मै तहेदिल से स्वागत करता हू तथा आशा करता हू कि भविष्य मे भी आप इसी प्रकार अच्छा सहयोग देगे।
                      यह आप लोगो की उदारता व परोपकार की भावना का ही उदाहरण हैं कि लोहार्गल जैसे पवित्र तीर्थ स्थल पर रैगर समाज की स्वयं की मन्दिर व धर्मशाला हैं। आज हमारे समाज की स्वयं की धर्मशाला होने के आने वाले श्रृदालुओ को दर-दर भटकना नही पड़ता। वर्ना पहले समाज के श्रृदालुओ को धर से लोहार्गल की तीर्थ यात्रा पर निकलने से पहले चिन्ता होने लगती थी कि बच्चों, औरतों व स्वयं उस अजनबी जगह मे कहा रुकेगे?, क्या खायेगे?,वहा कौन अपना होगा? लेकिन आज श्रृदालुओ को इस प्रकार की चिन्ता करने की बिल्कुल भी जरुरत नही हैं। यहा इस स्थान पर सभी अपने समाज के ही लोग मिलेगे।
                           मै फिर से समाज के सम्मानीय दान-दाताओं से  निवेदन करता हॅु कि आप सभी समाज के उत्थान के लिए दिल खोल कर सहयोग करे। जिससे हमारे समाज का सर्वोगीण विकास हों तथा हम उन्नति के पथ पर आगे बढे।
                   यहा मुझे बचपन मे सुने भजन की  एक पंक्ति याद आ रही हैं जो मेरे प्रिय ताउजी स्व. श्री गुमानाराम जी फुलवारिया, बगड़ निवासी मुझे सुनाया करते थे।-

                      “क्या लेकर आया बंदे, क्या लेकर जायेगा।
                       दो दिन की जिन्दगी है, दो दिन का मैला।।”

एक कवि ने कहा है -
                       “तेरा तुझको अर्पण हैं, क्या लागे है मेरा”

                     आज समाज मे दान-दाताओं की कमी नही हैं, बस कमी हैं तो इस बात की, उन्हे पैसे लगाने के लिए सही स्थान व  सही लोग नही मिले जो उनको प्रोत्साहित करे। आज समाज के ऐसे-2 दानवीर सेठ है जो एक बहुत बडा भवन लोहार्गल मे बना कर समाज को समर्पित करना चाहते हैं। लेकिन समस्या यह भी हैं कि उनको भवन बनाने के लिए बहुत जगह चाहिए। जिसका फिलहाल हमारे पास अभाव हैं।
                              लेकिन जगह हमे मिल सकती हैं, यदि हमारा सामुहिक प्रयास रहा तों। प्रयास करने से क्या नही हो सकता। लेकिन ये प्रयास पुरे समाज को मिलकर करना होगा। अकेले कार्यकारणी के भरोसे पर छोड़ने से नही।
                 यदि होसले बुलंद हो तो पहाड़ को चीर कर भी रास्ता बना दिया जाता हैं।
                रैगर समाज में बहुत ही अच्छे पढे लिखे उच्च अधिकारी, कर्मचारी कार्यरत हैं और बहुत रिटायर हो चुके हैं। समाज में सम्पन्न व्यापारी और जायदादों के मालिक हैं। अपने धर्म और अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित धार्मिक स्थान की उन्नति और उसकी पहचान बनाए रखना हम सभी का फर्ज बन जाता हैं। समाज के सभी लोगों को अपील की जाती हैं  कि वह स्वामी श्री खेतादास जी महाराज द्वारा स्थापित इस पावन धाम के विकास के लिए दिल खोल कर तन-मन-धन से सेवा करें।

2 टिप्‍पणियां:

  1. इस दिव्य धार्मिक स्थल के लिए मै भी समाज के समस्त महानुभाओ से विनम्र अपील करता हूँ कि हमें दिल खोलकर तन-मन-धन से सेवा करे .यह स्थल आपका है आपके लिए है .

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  2. चिडी चोंच भर ले गई नदी न घटियो नीर।
    दान किए धन न घटे, कह गये दास कबीर।।

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