शनिवार, 11 मई 2013

स्वामी श्री खेतादास जी महाराज का जीवन परिचय

स्वामी श्री खेतादास जी महाराज


                 आपका जन्म ग्राम मलसीसर ] जिला झुंझुनू राजस्थान मे हुआ था।  आपका मन सांसारिक कार्यो मे नही लगा और रुचि सतसंग मे बढने लगी। भजन किर्तन तथा साधु-सन्तो के प्रति आपका आकर्षण बढा। आपके गुरुजी का नाम श्री लक्ष्मण दास जी था। जो जाति से राजपूत थे।  आप बहुत अच्छे समाज सुधारक थे। आपने अनेक लोगो को दुव्र्यसनो से मुक्ति दिलाई। आपके उपदेश तथा सद्कार्यो से लोग बहुत प्रभावित होते थे। आपके शिष्य पुरे देश मे बसे हुए हैं। आपने अपने जीवन काल मे अपनी साधना शक्ति और उत्तम चरित्र के कारण बहुत से चमत्कारी परचे दिये हैं। जो कि अविश्मरणीय है। आपने गॉव-गॉव जाकर अपने समाज के लोगो को सामाजिक कुरीतियो एवमं बुराइयों को त्यागने व सामाजिक चेतना जागृत करने पर बल दिया। व समाज के लोगों को दारु-मांस जैसे दुव्र्यसनो से दुर रहने का मंत्र दिया।

                    आपके संपर्क सुत्रो व शिष्यो से पता चला कि आप रात्रि को शरीर से आत्मा को निकाल कर विभिन्न रुप धारण कर रात्रि विचरण को चले जाते थे। इस बात कि जानकारी सिर्फ आपके कुछ खास शिष्यों को ही थी।बस यही कारण आपकी मृत्यु का बना।
                     आपके शिष्यों ने बताया कि एक बार गुरुजी के पास किसी कारणवश मिलने हेतु उदयपुरवाटी ]झुंझुनू के रैगर समाज के लोग आये। आपने उनकी समस्या का समाधान भी किया। तथा वे शाम को आपसे विदा लेकर] अपने गॉव को निकल गये। उनकी विदाई के उपरान्त आपने अपने शरीर से आत्मविहीन शरीर को मंदिर मे छोड़ कर] रात्रि विचरण को चले जाते थे। लेकिन उधर आपसे मिलने आये उन व्यक्तियों को यातायात का कोई साधन नही मिलने के कारण वे पुनः मन्दिर में लौट आये। 
                     मन्दिर में लौटने पर जब उन्होने आपका आत्मा विहिन शरीर देखा तो उन्होनें आप को मृत समझा। और फिर आस पडौस के गॉवो से रैगर समाज के लोगो को इकट्ठा करके उन्होने अज्ञानता वश आपके शरीर का दाह-संस्कार कर दिया।
                      जब आपका दाह-संस्कार कि तैयारी हो रही थी। तब आपने ग्राम बगड़ झुंझुनू निवासी श्री ईश्वर राम जी फुलवारिया के सपने मे आये व उन्हे तुरत लोहार्गल पहुच कर देह को न जलाने को कहा। लेकिन उस समय यातायात व संचार के साधनो के आभाव मे उनको लोहार्गल पहुचने मे देरी हो गई। लेकिन तब तक सब कुछ खत्म हो चुका था। तब उन्होने व आपके ब्रहमलीन  की खबर सुनकर पधारे आपके अन्य शिष्यो मे स्वामी जी द्वारा देह छोड़कर भ्रमण करने की बात कही। इस प्रकार धोखे से आपकी मृत्यु हुई। लेकिन ऐसी महान आत्मा कभी मर नही सकती
वे आज भी ऐसा लगता है कि गुरुजी आर्शिवाद स्वरुप मे हमारे सम्मुख ही विराजमान हैं।  
                कुछ भक्तगण ये भी बताते हैं कि स्वामी जी ने विजय दशमी के दिन समाधी ली थी। इसलिए स्वामी जी के शिष्य व भक्तगण प्रत्येक माह की शुक्ल पक्ष दशमी को सत्संग का आयोजन व प्रशाद वितरण का पुण्य कार्य करते हैं।
           एक बार कि धटना हैं कि आप बाबाजी बनने के बाद जब अपने पैतृक गॉव लोटे रहे थे। तब आपके गॉव मे बने कॅुए मे पानी पीने पर  आपको स्वर्ण जाति के लोगों द्वारा प्रताड़ित किया गया व मार कर गॉव से बहार निकाला गया।
                    इस घटना के बाद उस गॉव मे जल स्त्रोतो का पानी खारा हो गया व कॅुओ का जल सुख भी गया। जब गॉव के लोगो को अपनी गलती का अहसास हुआ
तो वे आपको मनाने के लिए लोहार्गल धाम आये व अपने किये कि माफी मांगी। और आप ने उन लोगो को माफ भी कर दिया। और गॉव के जल स्त्रोतो व कॅुओ मे पुनः पानी भर आया।
                     आपने जीवन बहुत से चमत्कार किये हैं। जिनका यदि यहा वर्णन करे तो पुरा पोथा तैयार हो जायेगा। जैसे- आपका सत्संग मे शेर बनना] जरीकन के दुध की दारु बनना] सत्संग मे बैठे
बैठे गायब हो जाना। आपके आर्शिवाद स्वरुप आपके बहुत से भक्तो को संतान सुख की प्राप्ति होना तथा उनके कृष्टो का निवारण होना।
!! जय स्वामी श्री खेतादास जी महाराज की !!

शुक्रवार, 3 मई 2013

स्वामी श्री खेतादास मन्दिर, लोहार्गल

स्वामी श्री खेतादास  मन्दिर, लोहार्गल

                       
                    लोहार्गल धाम (झुंझुनू) के कुछ दुरी पर ही स्वामी श्री खेतादास जी महाराज द्वारा स्थापित रैगर समाज द्वारा संचालित रैगर धर्मशाला में  स्वामी खेतादास व स्वामी मखनदास जी का प्राचीन मन्दिर स्थित हैं। यह पवित्र धार्मिक स्थान लगभग 150 वर्ष प्राचीन हैं। इसे रैगर समाज का “शक्ति स्थल भी कहते हैं। रैगर  श्रृधापूर्वक धार्मिक आस्था से इस पवित्र स्थान से जुडे हुए हैं। जो कि उनका अपना हैं। समाज के लोग रैगर समाज का यहा प्रतिवर्ष भाद्रपद की अमावस्या को भरने वाले लोहार्गल विशाल मेला के अलावा वैशाख पूर्णिमा को रैगर
धर्मशाला   मे भव्य सत्संग व भण्डारा , मेला का कार्यक्रम होता हैं। यहॉ इस मन्दिर से रैगर समाज के लोगो की आस्था प्राचीन समय से ही जुड़ी हुई हैं। इसलिए बहुत अधिक संख्या मे यहा श्रृदालुगण पहुचते हैं। यहॉ छोटे बच्चों का मुण्डन व जात दी जाती हैं। और नव विवाहित जोडों की भी जात लगाई जाती हैं।
                   श्रृदालुगण को किसी प्रकार की परेशानी न हो इसलिए मन्दिर स्वामी खेतादास समिति द्वारा उन्हे यहा मुफ्त मे खाने पीने तथा रहने की सुविधा उपलब्ध की जाती हैं।  तथा यहा
धर्मशाला   मे स्वामणी, प्रसाद करने वाले व्यक्तियों के लिए बर्तन, चुल्हा, दरी-पट्टी, पानी आदि हर प्रकार की सुविधा निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती हैं।  समिति के भण्डार गृह मे इतना समान हैं कि आप एक साथ 10-12 सवामणी एक साथ कर सकते हैं।
                    समिति का संचालन समस्त रैगर समाज द्वारा दिये गये चन्दा राशि से किया जाता हैं। समाज का कोई भी व्यक्ति इस समिति का 1100 रुपये देकर आजीवन सदस्य बन सकता हैं। तथा समाज के लोगो द्वारा समिति के सफल संचालन के लिए एक कार्यकारणी का चुनाव प्रतिवर्ष
वैशाख पूर्णिमा के मेले पर किया जाता हैं। इसके अलावा मन्दिर मे पुजा-अर्चना करने के लिए समिति के  खर्चे पर पुजारी रहता हैं। मन्दिर व धर्मशाला कि देखभाल पुजारी, कार्यकारणी और आप जैसे महान लोगो पर हैं। मन्दिर व धर्मशाला के विकास मे आप लोगो द्वारा दिया गया सहयोग सरहनीय हैं, जिसका मै तहेदिल से स्वागत करता हू तथा आशा करता हू कि भविष्य मे भी आप इसी प्रकार अच्छा सहयोग देगे।
                      यह आप लोगो की उदारता व परोपकार की भावना का ही उदाहरण हैं कि लोहार्गल जैसे पवित्र तीर्थ स्थल पर रैगर समाज की स्वयं की मन्दिर व धर्मशाला हैं। आज हमारे समाज की स्वयं की धर्मशाला होने के आने वाले श्रृदालुओ को दर-दर भटकना नही पड़ता। वर्ना पहले समाज के श्रृदालुओ को धर से लोहार्गल की तीर्थ यात्रा पर निकलने से पहले चिन्ता होने लगती थी कि बच्चों, औरतों व स्वयं उस अजनबी जगह मे कहा रुकेगे?, क्या खायेगे?,वहा कौन अपना होगा? लेकिन आज श्रृदालुओ को इस प्रकार की चिन्ता करने की बिल्कुल भी जरुरत नही हैं। यहा इस स्थान पर सभी अपने समाज के ही लोग मिलेगे।
                           मै फिर से समाज के सम्मानीय दान-दाताओं से  निवेदन करता हॅु कि आप सभी समाज के उत्थान के लिए दिल खोल कर सहयोग करे। जिससे हमारे समाज का सर्वोगीण विकास हों तथा हम उन्नति के पथ पर आगे बढे।
                   यहा मुझे बचपन मे सुने भजन की  एक पंक्ति याद आ रही हैं जो मेरे प्रिय ताउजी स्व. श्री गुमानाराम जी फुलवारिया, बगड़ निवासी मुझे सुनाया करते थे।-

                      “क्या लेकर आया बंदे, क्या लेकर जायेगा।
                       दो दिन की जिन्दगी है, दो दिन का मैला।।”

एक कवि ने कहा है -
                       “तेरा तुझको अर्पण हैं, क्या लागे है मेरा”

                     आज समाज मे दान-दाताओं की कमी नही हैं, बस कमी हैं तो इस बात की, उन्हे पैसे लगाने के लिए सही स्थान व  सही लोग नही मिले जो उनको प्रोत्साहित करे। आज समाज के ऐसे-2 दानवीर सेठ है जो एक बहुत बडा भवन लोहार्गल मे बना कर समाज को समर्पित करना चाहते हैं। लेकिन समस्या यह भी हैं कि उनको भवन बनाने के लिए बहुत जगह चाहिए। जिसका फिलहाल हमारे पास अभाव हैं।
                              लेकिन जगह हमे मिल सकती हैं, यदि हमारा सामुहिक प्रयास रहा तों। प्रयास करने से क्या नही हो सकता। लेकिन ये प्रयास पुरे समाज को मिलकर करना होगा। अकेले कार्यकारणी के भरोसे पर छोड़ने से नही।
                 यदि होसले बुलंद हो तो पहाड़ को चीर कर भी रास्ता बना दिया जाता हैं।
                रैगर समाज में बहुत ही अच्छे पढे लिखे उच्च अधिकारी, कर्मचारी कार्यरत हैं और बहुत रिटायर हो चुके हैं। समाज में सम्पन्न व्यापारी और जायदादों के मालिक हैं। अपने धर्म और अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित धार्मिक स्थान की उन्नति और उसकी पहचान बनाए रखना हम सभी का फर्ज बन जाता हैं। समाज के सभी लोगों को अपील की जाती हैं  कि वह स्वामी श्री खेतादास जी महाराज द्वारा स्थापित इस पावन धाम के विकास के लिए दिल खोल कर तन-मन-धन से सेवा करें।

लोहार्गल धाम एक नजर में

लोहार्गल धाम

                       
                          भारतवर्श के राजस्थान प्रान्त के झुंझुनू जिला मुख्यालय से 70 कि.मी. दुर स्थित लोहार्गल पवित्र स्थान अपनी सौन्दर्यता से अभिभूत एक प्रमुख धार्मिक स्थल हैं। लोहार्गल घाम, तहसील उदयपुरवाटी जिला झुन्झुनू, उदयपुरवाटी सीकर हाईवे पर गोलियाना से 4-5 किलोमीटर अन्दर पहाडों के बीच शांत और रमणीक स्थान पर स्थित हैं। यहा की छटा देखने पर पृथ्वी के स्वर्ग का सा नजारा अनुभव होता हैं। यहॉ प्रतिवर्ष लाखो श्रृदालू इस रमणीय पर्यटन स्थल पर घुमने आते हैं। इस स्थान पर प्राचीन सूर्य मन्दिर स्थित हैं। यहा आने वाले श्रृद्धालू सर्वप्रथम यहॉ स्थित कुुण्ड मे स्नान करते हैं। इस कुण्ड पर प्रकृति की कृपा दृष्ट्रि से लगातार पहाड़ो से पानी आता रहता हैं। यह पानी कुण्ड मे, कुण्ड के पास स्थित गौमुख द्वार से लगातार कुण्ड मे बहता रहता है। यहा आने वाले श्रृद्धालू कुण्ड मे स्नान करने के उपरान्त सूर्य मन्दिर के दर्षन व बरखण्डी की परिक्रमा प्रारम्भ करते हैं। इस पवित्र स्थान पर प्रतिवर्ष भाद्रपद की अमावस्या को विषाल मेला भरता हैं। जिसे देखने के लिए, दुर दराज के प्रदेषो से श्रृद्धालू आते हैं। इस स्थान पर लोगो का ठहरने के लिए विभिन्न जाति विषेष के लोगो द्वारा बनाए गये मन्दिर व धर्मषालाऐ स्थित हैं।
                     लोहार्गल धाम के चारों तरफ आम के घने वृक्ष लगे हैं, जो वहा के स्थानिय लोगो की आय का साधन हैं। सबसे प्रमुख बात यह है कि लोहार्गल मे बिकने वाला आचार पुरे देष मे प्रसिद्ध हैं। लोहार्गल आने वाले यात्री यहा का प्रसिद्ध विभिन्न प्रकार के आचार भारी मात्रा मे ले जाते हैं।
                   प्राकृतिक की गोद मे स्थित लोहार्गल धाम मे श्रावण के पूरे महिने भर कावड ले जाने वाले षिव भक्तो की भीड़ लगी होती हैं। लोहार्गल धाम के सभी रास्तो “ बोल बम, ताडक बम” के नारो से गुंजते रहते हैं। षिव भक्त लोहार्गल कुण्ड से निकलने वाले पवित्र जल को झारी (लोटा) मे भर कर, सावधानी पूर्वक कावड में सजा कर, अपने इष्ट देव शंकर जी को चढाने के लिए गृह स्थान पर लाते हैं।